पुस्तक समीक्षा: गुनगुनाता हूँ (रचयिता- गिरिराज व्यास)
नागौर के उदीयमान रचनाकार गिरिराज व्यास की सद्यः प्रकाशित पुस्तक 'गुनगुनाता हूँ' में अध्यात्म, राष्ट्रीयता व नैतिक मूल्यों की त्रिवेणी का अनूठा संगम है, वहीं हृदय के भावों के सोते से निसृत मधुर गजलें व गीत भी मन को आह्लादित करते हैं।
कवि मन की ऊर्मियाँ भक्ति व अध्यात्म में तरंगित होती हुई निराकार रूप को अभिव्यंजित करती कुछ यों गुनगुनाने लगती है—
अनादि अनंत अभेद अखंड
यत्र-तत्र-सर्वत्र ओम्कारा
ओम् कारा ओम् कारा ओम् कारा
ओssss म् कारा।।
कभी आशिकी में सराबोर दिलकश ख्याल महफिल की रवानगी को और रंगीन होने तक होशोहवाश तक खो देते हैं—
होश की बातें कही और मयकदा चलने दिया।
आशिकी ने होश को भी कहाँ पता चलने दिया।।
प्रेम के ढाई आखर को समझनेवाले भले पंडित कहलाएं, पर अधिकांश लोग इसे भला इसे कहाँ जान पाते हैं? कवि आत्मचक्षुओं से प्यार की कशिश को अनुभूत करने की बात करता है —
न किस्सा न ही कहानी कहो
मुहब्बत है तो जुबानी कहो
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वर्ण है ना व्याकरण, अर्थ गढ़ लिया करो।
आत्मा की आँख से प्यार पढ़ लिया करो।
युवा पीढ़ी को दिनकर की मानिंद हिम्मत और साहस की जिंदगी देने का प्रयास भी प्रशंसनीय है। बाधाओं और कठिनाइयों में भी हर पल पौरुष के सहारे बढ़ने की नसीहत नितांत खुबसूरत बन पड़ी है—
पौरुष पुरुष का झंझा के तांडव से कब हारा है।
मांझी तेरी हिम्मत को तूफानों ने ललकारा है।
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जलजले तो आते-जाते रहते
ये रुकी कश्तियाँ फिर चला देगी।
धीरज रखवमन तू थोड़ा और
हिम्मत मुश्कलों को हरा देगी।।
राष्ट्रकवि गुप्त की तरह मनुष्य जीवन की सार्थकता सिद्ध करने का आह्वान भी कुछ नया करने का ज़ज्बा पैदा करते हैं —
साथी इस दुनिया में आकर, तू कुछ नया कर।
तू कुछ नया कर, हो यारा तू कुछ नया कर।।
कवि राष्ट्र के गौरव व अतीत को चित्रित करने के साथ हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी की महिमा को काव्यमय बनाता हुआ उसे जन जन की भाषा करार देता है—
वीरों के कण-कण से पावन
रक्त भरे यहाँ ताल हैं।
शरणागत के रक्षक हम
दुश्मन के महाकाल हैं।
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जन जन की धड़कन ये बोले
जय-जय हिन्दी राष्ट्र- भाषा।
कंठ-कंठ ये गिरा सुशोभित
हिन्दी भारत मन अभिलाषा।
शिक्षक कवि भारत की नारी शक्ति को भी हमेशा अगली पंक्ति में देखने की हिमाकत करते हैं व भारत की बेटियों को श्रेष्ठता की प्रतिमूर्ति मानकर उनके वैशिष्ट्य को यों चित्रित करते हैं —
धड़कन है वतन की ये हैं वतन की चहेतियाँ
आस्माँ मुट्ठी में करलें भारत की ये बेटियाँ।
कवि का मन सुफियाना होकर यायावरी के शांत बगीचे में विचरण करने लगता है और जिंदगी के फलसफे़ को समझने का भी यत्न करता है तो कभी निर्लिप्त होकर प्रेम के पारावार में गोते लगाने लगता है —
अलमस्त है हर हाल में ना गमों का बोझ।
जिंदगी की मौज है ये जिंदगी की मौज।।
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छोटी-सी है जिंदगी है दिन दो-चार की।
चलो देख आएं यार हम गली प्यार की।।
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दौलतें ना शोहरतें ना खिताब चाहिए।
इश्क पढ़ रहा हूँ प्यार की किताब चाहिए।।
'गुनगुनाता हूँ' पुस्तक महज काव्य संग्रह न होकर नैतिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने का सायास प्रयत्न भी है। पाश्चात्य आबोहवा में खोई वर्तमान पीढ़ी को हमारी सांस्कृतिक मूल्यों के तत्वों को जानने व माता पिता के दर्जे व उनके उदात्त रूप को समझने की सीख इन रचनाओं में है—
छूकर चरण पिता के, करलो इनकी पूजा।
एक ईश्वर आस्माँ पे, जमीं पे ईश्वर दूजा।।
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नमन मात-पिता शतबार, जीवन के आधार।
तुम पूजा तुम ही अर्चन, तुम ईश्वर साकार।
कोरोना जैसी महामारी में भी कवि सजग होकर जीवन जीने का संदेश देते हैं और बेहतर भविष्य के वरण की बात करते हैं ताकि निराश व्यक्ति भी जिजीविषा के सहारे सुखद जीवन की आशा बरकरार रखे—
प्रकृति और प्रभु क्या दे रहे संदेश?
इस महाव्याधि से कुछ सीखे देश-विदेश।
शैलीगत दृष्टि से भी कविताओं के काव्य सौंदर्य पर दृष्टिपात करें तो यहाँ ओज, प्रसाद व माधुर्य की त्रिवेणी का संगम बेहतरीन ढंग से हुआ है। तत्सम व अरबी- फारसी शब्दों का बाहुल्य रचनाओं का स्तर बढ़ाता है व प्रभावित करता है। इनके साथ लयात्मकता, चित्रात्मकता, लाक्षणिकता व अनुप्रास और रूपक की यत्र तत्र छटा दृष्टिगोचर होती है।
मौला मेरे मौला, मुश्किलों का है मेला।
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अनादि अनंत अभेद अखंड।
तकदीर की लकीरों/ जिंदगी की मौज/ औलियों की बंदगी/प्यार की बहरें/प्रभु की प्रीत....
विभिन्न भावों के झरते सोतों के साथ ब्रह्मानंद सहोदर यानि आनंद की प्राप्ति जैसे काव्य प्रयोजन की सार्थकता चरितार्थ हुई है।
भाव सौंदर्य के तहत वीर, शृंगार, भक्ति व शांत रस की रचनाओं का सम्मिश्रण पुस्तक को रोचक व पठनीय बनाता है।
बुद्धि कला गुण सकल, वाक् सिद्धि वर दायिनी।
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वक्त पलट देता है हर बाजी।
तूफानों को हरा देता माँझी।।
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सुन के दिल की गज़ल सनम कहाँ जा रहे हो।
हुस्ने मल्लिका मुझे तेरा जवाब चाहिए।
विचार सौंदर्य की दृष्टि से राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक गौरव, नैतिक मूल्यों व व्यावहारिक शिक्षा का समावेश कवि द्वारा संस्कृति के तत्वों को अक्षुण्ण रखने का सार्थक प्रयास है।
अनुप्रास, पुनरुक्ति के द्वारा लय व तुक की उपस्थिति से नाद सौंदर्य द्रष्टव्य है—
जन-जन, जय-जय, रोम-रोम, कण-कण, क्षण-क्षण, कदम-कदम, कोरे-कोरे इत्यादि पुनरुक्ति के द्वारा विशेष प्रभाव पैदा करते हैं। रूप, धर्म व प्रभाव साम्य के आधार पर अप्रस्तुत योजना भी बेहतरीन साबित हुई है।
सारांशतः पुस्तक 'गुनगुनाता हूँ' युवा पीढ़ी व किशोरवय के साथ उम्रदराज व्यक्तियों को भी लुभानेवाली रचनाओं का संकलन है। समकालीन रचनाओं से लबरेज छंदबद्ध व बहर में रचित ग़ज़लें जीवन के सार को प्रस्तुत कर मन को सुकून देनेवाली है। पुस्तक की रचना हेतु साधुवाद व भविष्य के बेहतर साहित्य-सर्जन की उम्मीद व विश्वास की मनःकामना के साथ पुनश्च आभार।
© मनोज व्यास, व्याख्याता (हिन्दी)
राउमावि जोधियासी (नागौर)

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