नागीणे रा नगीणा अर नामी कवि डाॅ गजादानजी सक्तिसुत री दो हाल में प्रकासित पोथ्यां "सबद सारंग" अर "अंतस री आवाज" म्हारे कने बड़े हेत सूं पूगी। म्हूं उणाने घणे चाव सूं भणी पढी अर उण पर छोटी सी टीप लिखण री हिम्मत करी जिकी इण मुजब है।
"सबद सारंग अर अंतस री आवाज" में अलंकार विधान अर भासा सैली~
दोन्यूं पोथ्यां में आपणी रीत रिवाजां, तीज तिवारां री खणकती रमझोळ री झणकार रे सागै सामाजिक, समसामयिक अर लूंठै चिंतन री घणी ऊंडी दीठ निजर आवै। भासा सैली री बात करां तो छंदबद्ध रचनावां री लांबी माळावां पिरोता थकां कवि उणामें दूहा, छप्पय, पद, सवैया, डोढा छप्पय सागै मन रो मिठास उड़ेलबा री चोखी जुगत दिखावै है। राजस्थानी रे सागै हिन्दी अर उर्दू रा सबद ठौड़ ठौड़ आता थकां कवि री गहरी समझ अर भासा रे ज्ञान रो चमक चानणो दिखावै। कवि नुवे जमाने री बातां ने ठीमर बतावण रे सागै जूनी कूड़ी रीतां ने बदलण री हूंस दिखावै। मायड़भासा रे आखर री ओळखाण इणरी मोटी संपत है, आ रचनावां में घणी ठौड़ आपरो करतब दिखावे।
जहान, महफिल, नफरत, सिफर, इलम, गफलत, नफा, फानूस, परवाज, जंग, फगत, सवाल, फनकारी, रवायत, एतबार, मजलिस, वजीफा, खुद्दार, इजाजत जेड़ा घणकरां सबद कविता में गजादानजी री उरदू पर चोखी पकड़ रो दिखसाव करे अर इणसूं रचनावां रो जायको पण बढावै। भवोदधि, वृच्छिक, स्वाति, सूकर, उर, चातक, सास्वत, गरदभ, स्वान, सुकृत, मरम, विहंग, बायस, आनन, हलाहल, भुवन, मरकट, निरपराध, निर्ममता, गात, मोद, वनिता जिसा मोकळा तत्सम अर तदभव सबदां रो प्रयोग रचनाकार रो कवि धरम निभावण रो चोखो जोग दरसावै।
दोन्यूं पोथ्यां में अलंकारां री चरचा करां तो आ बात आपणे साम्ही आवै'क घणकरां अलंकार अे रचनावां में
आपरी हाजरी दी है। राजस्थानी रा जूनां कवियां रो वाल्हो अलंकार वयण सगाई रो प्रयोग इणमें जग्या जग्यां निजर आवै है-
★सूरज बण अंधारो सोखो।
★जीवण असली रंग जवानां।
★मन मजबूती राख्यां मरदां।
★ कण-कण में कड़पाण।
हिन्दी में मोकळो काम आबाळो अलंकार अनुप्रास रो खासो प्रयोग अे रचनावां में इण सारू दिसै-
★कितरां कोड करया करता हा
★बरस बीत्यां बरगदां रै
★रातूं रात राख रळ जावै
★गरब गळ्यो गोरां रो
★ तीखै तौर तमाम
★खेंच खांडो खळकायो
छेकानुप्रास-
★जण-जण, रण-रण, भण-भण, खण-खण, जिण-जिण, किण-किण
अंत्यानुप्रास-
★कीनो, लीनो/ बातां, ख्यातां/ दोहरायो, समझायो/ चढावां, बचावां
श्रुत्यनुप्रास-
★जागै, सागै/ कटारो, काढियो/ जठ, सुभट/
अेक ही सबद रो नुवां अरथ सागै फेरूं प्रयोग यमक नाम सूं जाणीजे जिकां रो भी दरसाव केई ठौड़ इण भांत है-
★सिंदूर दूध अर राखी री
कीमत दे राखी आजादी।
अेक ही सबद रा घणां मतलब बताता सबदां रो प्रयोग श्लेष नाम सूं आपरो बरताव करे इणरी पूग पण रचनावां में है-
★बो बाग दिनोदिन उजड़ै है।
★या खुद माळी सूं बात करां
रचना में अेक बात या मिनख रो घणी भांत सूं वर्णन सागै मोकळी बातां रो अेकट प्रयोग करणो उल्लेख नाम सूं जाणीजे-
★कुळ मरजादा कायदा
नीति सनेह नसीत
माँ सूं बिण माँग्या मिल्या
रस्म रवायत रीत।
★ धनवानां रै नोट रूप थूं
नेतावां रै वोट रूप थूं
विद्वानां रै वाद विमर्सा
दीन घरां लंगोट रूप थूं।
बिहारी रो चावो अलंकार अन्योक्ति रो प्रयोग पण दिसै-
★वा देवां सूं दगो जकां री
साँझ सकारे जोत जगावै
बेमेल बातां रो सागै दिखसाव विषम रे नाम सूं इयां निजर आवै-
★सुधी कोकिला रही सिफर में।
उपमेय में उपमान रो आरोपण रूपक रो मोकळो प्रयोग अे रचनावां में हुयो है-
★बाबल री लाठी, आँख रो तारो, रिस्तां री बुणगट, वंस-वेल, गुणां री खाण, स्नेह-गंगा, पौध- पुण्याई, घर री साख, धरम बीज, नेह-नाडां, रण-आँगण, नफरत रा बीज, विकास री आँधी, श्रम साधना, कपट रा जाळ, जीवण री जोत
सबदां रो दोहरो प्रयोग पुनरुक्ति रे नाम सूं रचना री सोभा बढाई है-
★साँस-साँस, तर-तर, कर-कर, अपणो-अपणो, आँख-आँख, जण-जण, बात-बात, चूंच-चूंच,
विषम रो उलटो सम रो पण दरसाव मिलै-
★जीवटता नैं सौ जग पूजै
आंकस राखो अंग जवानां।
घणा कोड, घिरणा अथवा सोक वास्ते सबदां रो दोहराव वीप्सा रे नाम सूं केई ठौड़ आपरी छटा बिखेरे है-
★अजे घर आयो नहीं
इम कह-कह अकुलात।
★नव संवत्सर नेह रो
गेह-गेह व्है गान।
★ वध-वध लेऊं वारणा
कारण सागै कथन कैणो अर उणरो ठावो प्रयोग काव्यलिंग रो प्रयोग देखो-
★बोझ समझ मत बावळा
मती कोख में मार।
आफत घड़ियां आवतां
सुता पूछसी सार।
अेकट घणी उपमावां सूं नवाजणो
मालोपमा पण दिसै अर उणरो सांतरो प्रयोग केई रचनावां में इण भांत है-
★तूं गणगौर दीवाळी दिपती तीज तणो त्योहार लाडली।
★बूढा अनुभव समद अपारा, ज्ञान गंग री धारा है।
बूढा मेढ कडूंबै री है, बूढा इमरत झारा है।
★ अे नकटा अे निपट निकरमा
अे गुंडा अे आदमखोर, अे पापी अे ढोंगी पक्का, अे पाखंडी नामी चोर।
जठे बढ चढ महिमामंडित करीजे या जिकी बात मानबा में नीं आवै अेड़ी बात अतिशयोक्ति बण जावै, अर उणरो पण दिखसाव घणी रचनावां में निजर आवै है-
★मजलां खुद मिलबा नैं आसी।
★महादेव गळहार बण्यो थूं।
★इसड़ी आँख बणी ही कोनी।
★ तू आसमान रै अड़ जासी।
किणी चीज अर मिनख री तुलना दूजी नामी वस्तु अर प्राणी सूं करीजे तो उपमा नाम सूं पैचाणीजे-
★देह दीप माटी निरमळ सी
★बहनां रो लाखीणो बीरो
जठै विरोध दिखे पण साच्याणी नी हुवै तो विरोधाभास नाम सूं जाणीजे अर बो प्रयोग पण आपांनै अठै मिलै-
★समदर ने पाणी धमकावै।
सार रूप में आ बात साम्ही आवै'क दोन्यूं पोथ्यां गजादानजी री भासा पर चोखी पकड़ बतावै। दोन्यूं पाठकां सारूं चावी अर ठावी भणबा वाळी पोथ्यां है। इणमें आपणे समाज अर जनता री आज री झांकी निजर आवै है। चेतावणी रे सागै कवि लोगां अर नेतावां ने आडे हाथां लिया है। धरम, नीति, राजनीति, समाज, तिंवार री मोकळी बातां रो सांगोपांग चितराम इण रचनावां में उकेरता थकां कवि आपरे विसद ज्ञान रो प्रयोग दरसायो है।
कवितावां अर गीतां में नाद सौंदर्य रो लूंठो दरसाव है। भाव बिम्बा रो प्रयोग आपरी गहरी छाप छोड़े अर रचनावां ने लय, ताल सूं गावण री छमता बढावे है।
गजादानजी ने पोथ्यां सारूं मोकळी बधाई अर मायड़भासा रे ठावे प्रयोग मुजब नुवी पीढ़ी ने हौसलो अर ज्ञान देवण सारूं साधुवाद।
© मनोज व्यास