Thursday, June 23, 2022

पुस्तक समीक्षा: गुनगुनाता हूँ

 




पुस्तक समीक्षा: गुनगुनाता हूँ (रचयिता- गिरिराज व्यास)


        नागौर के उदीयमान रचनाकार गिरिराज व्यास की सद्यः प्रकाशित पुस्तक 'गुनगुनाता हूँ' में अध्यात्म, राष्ट्रीयता व नैतिक मूल्यों की त्रिवेणी का अनूठा संगम है, वहीं हृदय के भावों के सोते से निसृत मधुर गजलें व गीत भी मन को आह्लादित करते हैं।

        कवि मन की ऊर्मियाँ भक्ति व अध्यात्म में तरंगित होती हुई निराकार रूप को अभिव्यंजित करती कुछ यों गुनगुनाने लगती है—

अनादि अनंत अभेद अखंड

यत्र-तत्र-सर्वत्र ओम्कारा

ओम् कारा ओम् कारा ओम् कारा

ओssss म् कारा।।

        कभी आशिकी में सराबोर दिलकश ख्याल महफिल की रवानगी को और रंगीन होने तक होशोहवाश तक खो देते हैं—

होश की बातें कही और मयकदा चलने दिया।

आशिकी ने होश को भी कहाँ पता चलने दिया।।

          प्रेम के ढाई आखर को समझनेवाले भले पंडित कहलाएं, पर अधिकांश लोग इसे भला इसे कहाँ जान पाते हैं? कवि आत्मचक्षुओं से प्यार की कशिश को अनुभूत करने की बात करता है —

न किस्सा न ही कहानी कहो

मुहब्बत है तो जुबानी कहो

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वर्ण है ना व्याकरण, अर्थ गढ़ लिया करो।

आत्मा की आँख से प्यार पढ़ लिया करो।

          युवा पीढ़ी को दिनकर की मानिंद हिम्मत और साहस की जिंदगी देने का प्रयास भी  प्रशंसनीय है। बाधाओं और कठिनाइयों में भी हर पल पौरुष के सहारे बढ़ने की नसीहत नितांत खुबसूरत बन पड़ी है—

पौरुष पुरुष का झंझा के तांडव से कब हारा है।

मांझी तेरी हिम्मत को तूफानों ने ललकारा है।

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जलजले तो आते-जाते रहते

ये रुकी कश्तियाँ फिर चला देगी।

धीरज रखवमन तू थोड़ा और

हिम्मत मुश्कलों को हरा देगी।।  

          राष्ट्रकवि गुप्त की तरह मनुष्य जीवन की सार्थकता सिद्ध करने का आह्वान भी कुछ नया करने का ज़ज्बा पैदा करते हैं —

साथी इस दुनिया में आकर, तू कुछ नया कर।

तू कुछ नया कर, हो यारा तू कुछ नया कर।।          

           कवि राष्ट्र के गौरव व अतीत को चित्रित करने के साथ हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी की महिमा को काव्यमय बनाता हुआ उसे जन जन की भाषा करार देता है—

वीरों के कण-कण से पावन

रक्त भरे यहाँ ताल हैं।

शरणागत के रक्षक हम

दुश्मन के महाकाल हैं।      

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जन जन की धड़कन ये बोले

जय-जय हिन्दी राष्ट्र- भाषा।

कंठ-कंठ ये गिरा सुशोभित

हिन्दी भारत मन अभिलाषा।

           शिक्षक कवि भारत की नारी शक्ति को भी हमेशा अगली पंक्ति में देखने की हिमाकत करते हैं व भारत की बेटियों को श्रेष्ठता की प्रतिमूर्ति मानकर उनके वैशिष्ट्य को यों चित्रित करते हैं —

धड़कन है वतन की ये हैं वतन की चहेतियाँ

आस्माँ मुट्ठी में करलें भारत की ये बेटियाँ।   

            कवि का मन सुफियाना होकर यायावरी के शांत बगीचे में विचरण करने लगता है और जिंदगी के फलसफे़ को समझने का भी यत्न करता है तो कभी निर्लिप्त होकर प्रेम के पारावार में गोते लगाने लगता है —

अलमस्त है हर हाल में ना गमों का बोझ।

जिंदगी की मौज है ये जिंदगी की मौज।।

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छोटी-सी है जिंदगी है दिन दो-चार की।

चलो देख आएं यार हम गली प्यार की।।

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दौलतें ना शोहरतें ना खिताब चाहिए।

इश्क पढ़ रहा हूँ प्यार की किताब चाहिए।।          

            'गुनगुनाता हूँ' पुस्तक महज काव्य संग्रह न होकर नैतिक मूल्यों को पुनर्जीवित करने का सायास प्रयत्न भी है। पाश्चात्य आबोहवा में खोई वर्तमान पीढ़ी को हमारी सांस्कृतिक मूल्यों के तत्वों को जानने व माता पिता के दर्जे व उनके उदात्त रूप को समझने की सीख इन रचनाओं में है—

छूकर चरण पिता के, करलो इनकी पूजा।

एक ईश्वर आस्माँ पे, जमीं पे ईश्वर दूजा।।

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नमन मात-पिता शतबार, जीवन के आधार।

तुम पूजा तुम ही अर्चन, तुम ईश्वर साकार।

            कोरोना जैसी महामारी में भी कवि सजग होकर जीवन जीने का संदेश देते हैं और बेहतर भविष्य के वरण की बात करते हैं ताकि निराश व्यक्ति भी जिजीविषा के सहारे सुखद जीवन की आशा बरकरार रखे—

प्रकृति और प्रभु क्या दे रहे संदेश?

इस महाव्याधि से कुछ सीखे देश-विदेश।         

              शैलीगत दृष्टि से भी कविताओं के काव्य सौंदर्य पर दृष्टिपात करें तो यहाँ ओज, प्रसाद व माधुर्य की त्रिवेणी का संगम बेहतरीन ढंग से हुआ है। तत्सम व अरबी- फारसी शब्दों का बाहुल्य रचनाओं का स्तर बढ़ाता है व प्रभावित करता है।  इनके साथ लयात्मकता, चित्रात्मकता, लाक्षणिकता व अनुप्रास और रूपक की यत्र तत्र छटा दृष्टिगोचर होती है।   

मौला मेरे मौला, मुश्किलों का है मेला।

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अनादि अनंत अभेद अखंड।  

तकदीर की लकीरों/ जिंदगी की मौज/ औलियों की बंदगी/प्यार की बहरें/प्रभु की प्रीत....            

             विभिन्न भावों के झरते सोतों के साथ ब्रह्मानंद सहोदर यानि आनंद की प्राप्ति जैसे काव्य प्रयोजन की सार्थकता चरितार्थ हुई है।

भाव सौंदर्य के तहत वीर, शृंगार, भक्ति व शांत रस की रचनाओं का सम्मिश्रण पुस्तक को रोचक व पठनीय बनाता है। 

बुद्धि कला गुण सकल, वाक् सिद्धि वर दायिनी।

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वक्त पलट देता है हर बाजी।

तूफानों को हरा देता माँझी।।

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सुन के दिल की गज़ल सनम कहाँ जा रहे हो।

हुस्ने मल्लिका मुझे तेरा जवाब चाहिए।

           विचार सौंदर्य की दृष्टि से राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक गौरव, नैतिक मूल्यों व व्यावहारिक शिक्षा का समावेश कवि द्वारा संस्कृति के तत्वों को अक्षुण्ण रखने का सार्थक प्रयास है।

अनुप्रास, पुनरुक्ति के द्वारा लय व तुक की उपस्थिति से नाद सौंदर्य द्रष्टव्य है—

जन-जन, जय-जय, रोम-रोम, कण-कण, क्षण-क्षण, कदम-कदम, कोरे-कोरे इत्यादि पुनरुक्ति के द्वारा विशेष प्रभाव पैदा करते हैं। रूप, धर्म व प्रभाव साम्य के आधार पर अप्रस्तुत योजना भी बेहतरीन साबित हुई है।   

              सारांशतः पुस्तक 'गुनगुनाता हूँ' युवा पीढ़ी व किशोरवय के साथ उम्रदराज व्यक्तियों को भी लुभानेवाली रचनाओं का संकलन है। समकालीन रचनाओं से लबरेज छंदबद्ध व बहर में रचित ग़ज़लें जीवन के सार को प्रस्तुत कर मन को सुकून देनेवाली है। पुस्तक की रचना हेतु साधुवाद व भविष्य के बेहतर साहित्य-सर्जन की उम्मीद व विश्वास की मनःकामना के साथ पुनश्च आभार।

              © मनोज व्यास, व्याख्याता (हिन्दी)

                राउमावि जोधियासी (नागौर)    

Tuesday, June 21, 2022

योग दिवस समारोहपूर्वक मनाया

 








योग दिवस समारोहपूर्वक मनाया ~

          रा.उ.मा.वि., जोधियासी (नागौर) में 8वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन समारोहपूर्वक किया गया। प्रधानाचार्य मनोज व्यास ने अष्टांग योग का महत्व बताते हुए नियमित योग व प्राणायाम करने का आह्वान किया। 

           आयुर्वेद चिकित्सक संतप्रसाद त्रिपाठी के निर्देशन में विभिन्न आसन व प्राणायाम का अभ्यास करवाए गये। उन्होंने स्वस्थ शरीर हेतु योग व प्राणायाम की महत्ता को बताते हुए उत्तम स्वास्थ्य  संबंधी गुर बताए।

            ग्राम पंचायत जोधियासी की सभी राजकीय व निजी स्कूल के शिक्षकों, अन्य विभागों के कार्मिकों, आँगनवाड़ी कार्यकर्ता, साथिन, आशा सहयोगिनी व विद्यार्थियों ने पूर्ण तल्लीनता से योग क्रियाएँ की।

      कार्यक्रम में हिस्सा लेनेवालों में चिकित्सक डाॅ रामूराम, शाला स्टाफ रामेश्वर लाल, अंजू शर्मा, कन्हैयालाल, चोखाराम, कालूराम, रमेशनाथ,  प्रहलाद सहाय, धनसुखराम व अन्य कार्मिकों में श्रवणसिंह, माँगूसिंह, दिनेश बंजारा, मानाराम, मंजु ओझा, बेगनाथ, लोकेश निरंजनी, हनुमानदास, देवाराम, गिरधारीराम, सरिता, संतोष, प्रेमादेवी,  पार्वती, राजकुमार शर्मा, छैलाराम, टीनू कंवर, राजल, पवन सारस्वत, मनीष, ऋतु सहित विभिन्न अभिभावकगण व विद्यार्थी उपस्थित रहे। व्याख्याता बोदूसिंह ने कार्यक्रम का सफल संचालन किया।

Saturday, June 18, 2022

पुस्तक "गुन‌गुनाता हूँ" का समारोहपूर्वक लोकार्पण

 


 पुस्तक "गुन‌गुनाता हूँ" का समारोहपूर्वक लोकार्पण















नागौर, आज नागौर स्थित गायत्री भवन- पारीकों की पोल के सभागार में शिक्षक कवि गिरिराज व्यास द्वारा लिखित तीसरी पुस्तक 'गुनगुनाता हूँ' के लोकार्पण समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार श्री चरणसिंह पथिक ने बतौर मुख्य अतिथि कहा कि कविता की साधना सबसे कठिन होती है, रचनाकार की समाज में बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है और हर रचना अपने समय का दस्तावेज होती है।  

         लोकार्पण समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में सम्बोधित करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार एवं प्रखर वक्ता श्री कृष्ण कल्पित ने कहा कि वीरों और कवियों का संबंध जैसा राजस्थान की धरा पर है ऐसा संबंध दुनिया में अन्यत्र दुर्लभ है। यह परम्परा निरन्तर चली आ रही है। उन्होंने गुनगुनाने और गाने में बड़ा अंतर बताया। 

         समारोह के अध्यक्ष व प्रखर वक्ता प्रो. भवानीशंकर रांकावत ने कहा कि कवि होना सहज काम नहीं है, कवि के द्वारा जो समाज में देखा व महसूस किया जाता है, उसे अपनी काव्य रचना के जरिए समाज के सामने रखता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र का गौरव और राष्ट्र की अस्मिता बनाये रखने का भी अहम दायित्व कवियों और साहित्यकारों का होता है। गिरिराज व्यास ने अपनी रचना में वर्तमान के दौर मैं जो भी चल रहा है, उसे उसे अपनी रचना‌ओं में बखूबी निभाया है। 

         गीतकार श्री धनराज दाधीच ने "गांव गली चौबारा छूट्‌या, एक पेट के कारणे" अपनी सुन्दर रचना सुनाकर सभी श्रोताओं को भाव विभोर किया। राजस्थानी भाषा के वरिष्ठ साहित्यकार पवन पहाड़िया ने कहा कि "गुनगुनाता हूँ" पुस्तक में लेखक गिरिराज व्यास ने छंद को प्रमुखता दी है और इसी कारण यह पुस्तक समृद्ध बन पाई है। उन्होंने बाल-साहित्य सृजन का आग्रह भी किया। 

      अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के संस्थापक वरिष्ठ साहित्यकार श्री लक्ष्मणदान कविया ने संबोधित करते हुए कहा कि "गुनगुनाता हूँ" काव्य रचना में गिरिराज व्यास ने विभिन्न विधाओं का समावेश किया है। यह कृति युवाओं हेतु प्रेरणादायक सिद्ध होगी। उन्होंने इन अवसर पर सभी साहित्यकारों को स्मृति चिन्ह भेंट किए। राजस्थानी ख्यातनाम कवि प्रहलाद सिंह झोरड़ा ने 'वीणा वादिनी मां सरस्वती' वन्दना प्रस्तुत की तथा राजस्थानी गीत प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। 

      इस अवसर पर हिन्दी व्याख्याता मनोज व्यास ने स्वागत भाषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह पुस्तक अध्यात्म, देशभक्ति और मानवीय जीवन मूल्यों की त्रिवेणी का अनूठा संगम है। उन्होंने काव्यांग विवेचन के जरिए पुस्तकीय समीक्षा भी की।

      समारोह में पुस्तक रचयिता श्री गिरिराज व्यास ने कहा कि जब भी कविताएं सशक्त हुई है तब-तब समाज और राष्ट्र मजबूत हुए हैं। उन्होंने कहा कि साहित्य वह प्रवाह है जो वर्तमान को जोड़ने का काम करता है। कवि-काव्य की दो स्थितियाँ होती है- पहली कवि जो काव्य बनाता है, जबकि दूसरी स्थिति वह जब काव्य कवि को बनाता है। इन दोनों में उन्होंने दूसरी स्थिति को श्रेष्ठ माना। उन्होंने साहित्यकारों के प्रेरक प्रसंगों के जरिए अपनी अभिव्यक्ति दी।

         विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार नरेन्द्र पारीक ने कार्यक्रम का संयोजन किया। गायक कलाकार मुन्ना स्वर्णकार का "गुनगुनाता हूँ" पुस्तक के पाँच गीतों को स्वर देने हेतु स्वागत किया गया। 

         इस अवसर पर बाल कलाकार सिद्धार्थ व्यास की 'बाल पुस्तिका "आओ बच्चों हम गीत लिखे" पुस्तक का अथितियों द्वारा लोकार्पण किया गया। साथ ही शहीद सुगनसिंह की स्मृति में साहित्यकार तिलोकचन्द्र द्वारा लिखित कविता "नमन" स्मृति चिह्न के रूप में शहीद सुगनसिंह के पुत्र श्री मांगूसिंह को भेंट किया गया। 

         समारोह में रामपाल व्यास, जंवरीलाल भट्ट, भंवरलाल कासनिया, निरंजन पारीक, महेंद्रपाल, आनंद पारीक, निरंजन व्यास, महावीर प्रसाद व्यास, महेश व्यास, दिलीप पित्ती, रामकिशोर फिडोदा, जिनेन्द्र जैन, शिवशंकर व्यास, मोहनराम कसवां, कुलदीप पारीक, धर्मपाल, श्रेयांश, गणपतलाल पारीक, शंकरलाल चतुर्वेदी, रामरतन लटियाल, बरंगलाल जोशी, अजयपाल, पृथ्वीराज, मंजु व्यास, चित्रा व्यास, चेतना व्यास, धर्मा व्यास, सरिता व्यास, दीपक, रियांश, कुणाल, प्रज्ञा, साक्षी, अविका आदि भी उपस्थित रहें। कार्यक्रम का सफल संचालन शरद जोशी ने किया।