Saturday, April 18, 2020

प्यार के साहित्यिक प्रतिमान~





प्रीत के कोई
उपमान नहीं होते,
वो खुद ही उपमा बन जाती।
तेरा अक्स ही तेरा प्रतीक-
अनुराग को किस
संज्ञा से नवाजा जाए,
प्यार की खातिर
विशेषण छोटे लगते।
तुम छंदबद्ध कविता
शील गुण ही तेरे अलंकार।
अहसासों की अन्विति
पाकर छलक जाते
कितने सारे संचारी भाव।
भावों की लक्षणा
या है शाब्दी-
कभी बन जाती अभिधा
तेरे यादों की मिठास।
चक्षुओं की कूट भाषा
में छिपे प्रेम के प्रतिमान।
सात्विकता की अनुभूति
पा लेता उल्लास।
यह कैसा भावोदय
और कैसी प्रीत प्रतीति-
बन जाती जब तब
अपनी प्यार परिवृत्ति।
उद्दीपन बनी स्मृतियाँ
पाके आहट का आलंबन।
क्या वियोग की कारणमाला
किस विचार की पुनरुक्ति
स्मरण में बसे हैं अभी
वो पूर्वराग और मान।
तुम मेरा विषय बन जाओ
मैं तुम्हारा आश्रय-
उपजेंगे कितने अनुभाव।
उस छुअन की कशिश
और व्रीड़ा से दीखता
तेरा वैवर्ण्य।
भाव संधि में उलझाते
तेरे नयन कटाक्ष।
प्रणय के रंग में
रंग गये मानो
माधुर्य और प्रसाद।
श्लिष्ट भावों में
अभंग होकर
उपजा संयोग शृंगार।
धृति की पराकाष्ठा
में छिपी अतिशयोक्ति-
यह औत्सुक्य
है या चपलता!
वियोग की भाषा
से सजी चौपाइयाँ।
दोहों में भी
सोरठे का
आभास कराती
तेरी अठखेलियाँ।
सवैये और कवित्त
अब बन गये
मेरे प्रेम पर्याय।
मदहोशी में कैसे बने
छंदबद्ध रचनाएँ-
आहट की आकुलता
से है आबद्ध अनुप्रास।
तेरा वर्ण, तेरी अलक
भुला देते वर्ण विन्यास-
मात्राओं का विपर्यय
हो जाता है अक्सर।
भाषाओं की खिचड़ी पके
पाकर तेरा साथ।
शैली और शब्द बहकते,
जब मदहोशी इठलाती
दरक जाते अक्षर कभी।
क्या तत्सम
क्या तद्भव
देशज का तड़का
दिलवा देती
तेरी भाव भंगिमाएं।
खामोशी भी तेरी
रेखाचित्र बनाती है।
कहानी लघुता लाती तो
तेरी मुस्कान-
उपन्यास लिखवाती है।
 © मनोज व्यास

साहित्यिक शब्दार्थ~

उपमान- जिससे उपमा दी जाए
अलंकार- काव्य के शोभा तत्त्व
अन्विति- परस्पर संबद्धता
संचारी भाव- मन में उत्पन्न क्षणिक भाव
लक्षणा- सामान्य अर्थ से भिन्न अर्थ देनेवाली शक्ति
शाब्दी- शब्द से उत्पन्न शब्द शक्ति
अभिधा- सामान्य अर्थ देने वाली शब्द शक्ति
भावोदय- एक भाव के शामत होने पर दूसरे का उत्पन्न होना जो अधिक चमत्कृत हो
प्रतीति- जानकारी, प्रतीत होना
परिवृत्ति- अलंकार जिसमें अदला बदली हो
उद्दीपन- उत्तेजना पैदा करने वाले कारक/तत्त्व
आलंबन- जिसके सहारे स्थायी भाव पैदा हो
कारणमाला- कार्य कारण भाव संबंध
पूर्वराग- वियोग का भेद जिसमें स्वप्न दर्शन
मान- मन मुटाव/ रूठना
विषय- जिसके प्रति भाव जाग्रत हो
आश्रय- जिसके मन में भाव जाग्रत हो
अनुभाव- स्थायी भाव के उपरांत मनोविकार/चेष्टाएँ
व्रीड़ा- लज्जा
वैवर्ण्य- रंग उड़ जाना
भाव संधि- समान चमत्कारी भावों का मिलना
माधुर्य और प्रसाद- साहित्यिक गुण
श्लिष्ट- चिपके हुए
धृति- धैर्य
औत्सुक्य- उत्सुकता
चपलता- चित्त की चंचलता
विपर्यय- प्रतिकूलता