प्रेम गागर छलकाती जा..
हिवड़ै में हिलोर उठाद्यै
प्रीत री पायलड़ी बजाद्यै
मन रो मोद सोवणो हुज्या
छम छम घूघरा घमकाती जा....
सावण सुरंगे जिसी दिखे
बासंती बायरे सी लागे है
प्रीत रा फुलड़ा खिल ज्यावे
सांसा री सारंगी बजाती जा.....
निजरां पल पल बाट जोवे
थारी खातर अे धीरज खोवे
हेत रा रूंखड़ा सूख जासी
अब प्रेम गागर छलकाती जा...
तनड़े मनड़े बसी थारी बातां
कीकर कटसी अे काळी रातां
कियां चसै हिवड़ै रो दिवळो
बस जीवण जोत जगाती जा...
सुपने में म्हारे नितके आवै
मीठी टिचकार्यां तो दे ज्यावै
फेरूं करलां कीं सयाणी बातां
नेह री थळगट बजाती जा....
© मनोज व्यास

अति सुंदर विचार अभिव्यक्ति।
ReplyDeleteप्रेम ही जीवन में ऊर्जा का संचार करता है।
आपने तो प्रेम का सागर लिख दिया है, साधुवाद
वाह व्यासजी। जबरदस्त पकड़ है मारवाड़ी भाषा पर।।
ReplyDeleteअति सुंदर।। 🙏
Very nice
ReplyDeleteशृंगार रस की सुन्दर कविता
ReplyDeleteसगळा रो घणैमान आभार सा
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