Tuesday, January 12, 2021

प्रेम गागर छलकाती जा


 


प्रेम गागर छलकाती जा..


हिवड़ै में हिलोर उठाद्यै

प्रीत री पायलड़ी बजाद्यै

मन रो मोद सोवणो हुज्या

छम छम घूघरा घमकाती जा....

सावण सुरंगे जिसी दिखे

बासंती बायरे सी लागे है

प्रीत रा फुलड़ा खिल ज्यावे

सांसा री सारंगी बजाती जा.....

निजरां पल पल बाट जोवे

थारी खातर अे धीरज खोवे

हेत रा रूंखड़ा सूख जासी

अब प्रेम गागर छलकाती जा...

तनड़े मनड़े बसी थारी बातां

कीकर कटसी अे काळी रातां

कियां चसै हिवड़ै रो दिवळो

बस जीवण जोत जगाती जा...

सुपने में म्हारे नितके आवै

मीठी टिचकार्यां तो दे ज्यावै

फेरूं करलां कीं सयाणी बातां

नेह री थळगट बजाती जा....

    © मनोज व्यास





5 comments:

  1. अति सुंदर विचार अभिव्यक्ति।
    प्रेम ही जीवन में ऊर्जा का संचार करता है।
    आपने तो प्रेम का सागर लिख दिया है, साधुवाद

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  2. वाह व्यासजी। जबरदस्त पकड़ है मारवाड़ी भाषा पर।।
    अति सुंदर।। 🙏

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  3. शृंगार रस की सुन्दर कविता

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  4. सगळा रो घणैमान आभार सा

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