Thursday, June 13, 2019

थारी ओळ्यूं


थारी ओळ्यूं~
गोरी थारी परघळती प्रीत ,
मनड़ा ने बिलमावै है।
जद देखूं ओ रूप निराळो,
हिये आणंद उपजावै है।
डस लेवै थारा काजळिया नैण,
जद आवै तूं सुरमो सार,
चेरै को ओपतो उजास,
आंख्यां में चमकी लावै है।
फीका लागै सै गैणा-गांठा,
अचपळिया-सा बण्योड़ा,
थारो शील अर संकोच,
जियां फुटरपो बढ़ावै है।
नीं सुझे अब जीवण री जुगत,
नीं कोई सिणगारुं मारग,
कल्पना री कोरणी में,
थारो ही अक्स  निजर आवै है।
न दिन रूड़ा लागै है,
न रातड़ली सुरंगी दिसै है,
हेज रै गुमैज मांय,
थारी ओळ्यूं गीतड़ला गावै है।
थारी रूपाळी रळक सिवा,
सै कीं तो बदरंग हुगा,
म्हारे मनड़े में निस दिन,
थारी प्रीत रंग बरसावै है।
अळगी है पण मन में बसी,
घड़ी घड़ी आभै रूपी,
थारे रूप री रमझोळ,
प्रीत री पायल छमकावै है।
प्रणय गीतां री लड़ियां,
मन री साख कियां भरै,
तू कोयल कंठां गीत गाती,
मन री वीणा बजावै है।
       © मनोज व्यास (13-6-19)

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