Saturday, January 5, 2019

शिक्षक व शिक्षण कार्य~

शिक्षक का यथार्थ और उसकी कार्यशैली पर बेबाक अभिव्यक्ति निस्सन्देह समीचीन प्रतीत होती है। पर महज छींटाकशी और छिद्रान्वेषण शिक्षकों में ऊर्जस्विता नहीं ला सकती अपितु उनके कार्यक्षमता को क्षीण करती है; उनके द्वारा कर्मठता की नयी ताबीर लिखने के जज्बे को बेवजह रोकती है। हर पल गैर शैक्षणिक कार्यों से रोड़े अटकाकर शिक्षण कार्य के नैरंतर्य को रोका जा रहा है।  शिक्षक के हृदय में तरंगित विभिन्न संवेगों को उद्घाटित करती मनःस्थिति; शिक्षा-सरिता को निर्बाध प्रवाहित करने में अनेकानेक विकट परिस्थितियाँ सुरसा की मानिंद दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। जहाँ कुछ शिक्षक भी पथ विचलित हो चले हैं, कुछ नैराश्य भावासिक्त विचारबोध में पूर्णरूपेण कार्य नहीं कर पा रहे। कुछ मीडिया का पक्षपातपूर्ण रवैया व अफसरशाही इसमें मानो आग में घी डालने का कार्य अंजाम दे रहा है। साथ ही समाजकंटक व संकीर्ण वैचारिकता से परिपूर्ण लोग अपनी मनःकामना को पूर्णाहुति देने को दृढ़संकल्प हैं। शिक्षा के मंदिर व पुजारियों के प्रति नकारात्मकता समाज के लोगों व अफसरों की हीन भावों की जीती जागती तस्वीर है। प्रतिपल शिक्षा पर आघात व प्रतिघात; मेहनतकश लोगों पर भी नुक्ताचीनी; विद्यालयों को महज कार्यशाला बनाके रख देना कमोबेश अनुचित लगता है। आज आवश्यकता है शिक्षक को पुनः गरिमा के पद पर प्रतिष्ठापित करने की; उसके मूल कार्यों से परिपूरित करने की व समाज के विक्षिप्त वैचारिकता के लोगों से निजात दिलवाकर शैक्षिक जागृति लाने की। वरना कुछ सालों में शिक्षा का बाजारीकरण होकर उसका उन्मुक्त उपहास उड़ाया जाएगा व समाज के ठेकेदार उसका जनाजा निकाल देंगे।
अतएव शिक्षकवृंद अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यबोध के प्रति सजगता दिखाएं।
साधुवाद।
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    © मनोज व्यास

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